Apr 06 2008

भारतीय उम्मीदों पर जातिवाद का ग्रहण

Tag: Deep Thinkers and Fools, Indian Culture, जिज्ञासासुदीप साकल्ले @ 8:47 pm

भारत के सत्तर प्रतिशत लोगों को भारतीय होने पर गर्व है और देश के पचास प्रतिशत से अधिक लोगों को लगता है कि जाति प्रथा सामाजिक समरसता में सबसे बड़ी बाधा है.
बीबीसी द्वारा कराए गए एक सर्वेक्षण में ये बातें सामने आई हैं.

सर्वेक्षण के अनुसार दस में से छह भारतीयों के लिए यह बात व्यक्तिगत तौर पर महत्वपूर्ण है कि उनका देश आर्थिक, सैनिक और राजनीतिक महाशक्ति के तौर पर उभरे.

सत्तर प्रतिशत लोगों को भारत का नागरिक होने में गर्व है लेकिन ऐसा नहीं है कि तनाव की कोई वजह नहीं है.

पचास प्रतिशत से अधिक लोग मानते हैं कि भारत को अपने नागरिकों से अधिक ख़तरा है यानी आंतरिक सुरक्षा बड़ा मसला है.

कई लोगों का यह भी मानना था कि समाज में कटु संबंधों का सबसे बड़ा कारण जाति प्रथा है.

इतना ही नहीं आधे से अधिक लोग भ्रष्टाचार को दैनन्दिन जीवन का अभिन्न अंग मान चुके हैं.

सर्वेक्षण में जहां कई लोगों में जहां बदलते सामाजिक परिवेश को लेकर गहरी चिंता देखी गई वहीं आधे से अधिक लोगों का कहना था कि भारतीय लोग धर्म को उतनी गंभीरता से नहीं लेते जितनी गंभीरता से धर्म के बारे में सोचना चाहिए.

एक तिहाई से अधिक लोगों का मानना था कि युवा वर्ग अपनी सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं को भूल चुका है. हालांकि सर्वे में युवा लोगों का कहना था कि वो इन मुद्दों पर वृद्धों से अधिक चिंतन मनन करते हैं.

एक और मुद्दे पर मत विभाजन बहुत स्पष्ट दिखा. ये मुद्दा था पिछले एक दशक में हुए आर्थिक सुधारों का. यह पूछे जाने पर कि क्या पिछले दशक के आर्थिक सुधारों से उनके या उनके परिवार को फ़ायदा हुआ तो कई लोगों ने कहा हां तो कई अन्य लोगों ने कहा बिल्कुल नहीं.

इस सर्वेक्षण में 1600 लोगों से बातचीत की गई और इसके लिए प्रश्न तय किए गए थे बीबीसी की वेबसाईटों के ज़रिए लोगों के सुझावों के आधार पर. यानी दुनिया भर के लोगों के सुझाव पर भारत के लोगों के लिए सवाल तय किए गए थे.


Apr 06 2008

काल परिमेयत्व - समय की इकाईयाँ (Units of Time)

काल परिमेयत्व

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समय की इकाईयाँ (Units of Time)
तारों, सूर्य, चन्द्रमा और अन्य ग्रहों के गमन कर्म (Motion) और गणितीय व्युत्पत्तियों के आधार पर ‘सूर्य सिद्धान्त’ काल (Time) के मापन की नौ पद्धतियों का विवेचन करता है।
तद्नुसार काल की नौ इकाईयाँ हैं। 1
इनके नाम इस प्रकार हैं-’

ब्राह्म’, ‘दिव्य’, ‘त्रिज्या प्राजापत्य’, ‘गौरव’, ‘सौर’, ‘सावन’, ‘चान्द्र’ और ‘आर्क्ष’।
प्रथम छ: इकाइयों ‘ब्राह्म से सौर पर्यन्त’ का प्रयोग ब्रह्माण्ड के आविर्भाव से व्यतीत होने वाले काल (समय) को परिभाषित करने में किया गया है। चान्द्रमान का उपयोग दैनिन्दिनदर्शिका पंचांग के निर्माण में होता है, जिससे विभिन्न संस्कारों तथा त्योहारों का निर्धारण किया जाता है। सावन दिन (Solar day) और नाक्षत्र दिन (Sidereal day) का उपयोग ग्रहों की गति (Planetary motion) की गणना में किया जाता है। आधुनिक भौतिक विज्ञान के इस युग में भी हमने समय की इन दो इकाइयों (Units) को महत्त्व दिया है। ‘सावन दिन’ अपनी उपयोगिता के कारण दोनों पद्धतियों (वैशेषिक एवं भौतिकी) में काल (Time) के मापन का ठोस एवं उत्तम आधार तैयार करता है।
प्राचीन भारतीय पद्धति में काल (Time) की इकाई का विभाजन और उपविभाजन अधोलिखित प्रकार से होता है-
६० विपल=१ पल
६० पल=१ घंटि (नाडी/दण्ड)
२१/२ घंटि=१ होरा (hour)
२४ होरा =१ सावन दिन
आधुनिक समय में हम काल (समय) का विभाजन तथा उपविभाजन निम्न प्रकार से करते हैं-
६० सैकेण्ड=१ मिनट
६० मिनट=१ घण्टा
२४ घण्टा=१ दिन (Solar day)
भारतीय ज्योतिष में ग्रह-गमने, के अर्थ में, जो भी पिण्ड अंतरिक्ष में नक्षत्रों के सापेक्ष हमें गति करते दिखते हैं वे ग्रह कहलाते हैं। ग्रह का शाब्दिक अर्थ प्लैनेट (Planet) के रूप में व्यवहार ज्योतिष की दृष्टि से असंगत है।
काल (समय) की इकाई (Unit) होरा (जो घण्टा : Hour के समतुल्य है) साप्ताहिक दिनों के नामों की व्यवस्था प्रदान करता है। भारतीय ज्योतिष शास्त्र के अनुसार प्रत्येक होरा (घण्टा) ग्रहनामों के अनुक्रम में पुकारी जाती है। यंत्र साधन के बिना सामान्य दृष्टि से दिखलाई पड़ने वाले ग्रह सात हैं। सूर्य परिवार के इन ग्रहों को हम शनि (Saturn), वृहस्पति (Jupiter), मंगल (Mass), सोम (पृथ्वी का उपग्रह:Moon), शुक्र (Venus), बुध (Mercury) और रवि (Sun) के रुप में जानते हैं। उपर्युक्त क्रम में ‘रवि’ और पृथ्वी के उपग्रह ‘सोम’ की स्थिति परस्पर परिवर्तित करने से ग्रहों का यह क्रम पृथ्वी से देखने पर पृथ्वी के सुदूर ग्रह से गिनने पर यह क्रम निम्न प्रकार से होगा।
यथा शनि, वृहस्पति, मंगल, रवि, शुक्र, बुध एवं चन्द्र। 2
यदि किसी दिन सूर्योदय के समय पहली होरा (hour) शनि की हो, तो दूसरी होरा वृहस्पति की होगी, इसी प्रकार गणना चक्रीय क्रम में करते जाँय तो दूसरे दिन सूर्योदय के समय रवि की होरा होगी। इसी प्रकार अगले दिन चन्द्र की, तत्पश्चात् इसी क्रम में अन्य ग्रहों की होरा स्थिति होगी।

सूर्योदय पर का घंटा (भ्वनत) जिस ग्रह के नाम होगा वही उस दिन का स्वामी होगा अर्थात् सात दिन का सप्ताह होगा एवं तत्पश्चात् शनिवार, रविवार, सोमवार, मंगलवार, बुधवार, गुरुवार एवं शुक्रवार इसी चक्रीय क्रम 3 में दिनों के नाम निर्धारित होते रहेंगे।
अगले अनुभागों में नाक्षत्र दिन (Sidereal day) एवं सावनदिन (solar day) का विवचेन करेंगे।
 

नाक्षत्र दिन (Sidereal day) :
आर्यभट्ट 4 के अनुसार यथा नाव पर बैठे व्यक्ति को नदी के किनारे स्थित स्थिर वस्तुओं को अपने सापेक्ष विपरीत दिशा में गतिशील देखता है उसी प्रकार नक्षत्र (नक्षरति इति नक्षत्र: अर्थात् दो नक्षत्रों के मध्य की दूरी स्थित रहती है।) गति करते दृष्टिगोचर होते हैं क्योंकि पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती रहती है।
यद्यपि पृथ्वी का गोल सतत् भ्रमणशील है परन्तु गाणितिक सरलता के लिये इसकी गति को नक्षत्रों पर आरोपित करते हैं तथा पृथ्वी को स्थिर मानते हैं। 5


भारतीय ज्योतिष ने एक नक्षत्र के दुबारा उदय होने के बीच लगने वाले समय को एक नाक्षत्र दिन (sidereal day) के रूप में परिभाषित किया है। भौतिकी के अनुसार भी पृथ्वी अपने कक्ष के परित: समानकोणीय गति से भ्रमण करती है। अत: पृथ्वी के केन्द्र पर स्थित एवं पृथ्वी के साथ घूमने वाले दर्शक को नक्षत्र मंडल समान गति से भ्रमण करता दिखता है। पृथ्वी का अपने अक्ष के परित: एक चक्कर लगाने में लगने वाला समय एक साइडरीयल डे (Sidereal day: नाक्षत्र दिन) कहलाता है।


सावन दिन या कुदिन (Solar day):
यदि किसी विशेष दिन कोई ग्रह किसी नक्षत्र के साथ हो तो दूसरे दिन वह उस नक्षत्र से कुछ पूर्व की ओर हटा हुआ दिखता है। 6


अत: यदि ग्रह नक्षत्र के सापेक्ष एक चक्कर पूर्ण करता है तो ग्रह की कुल चक्करों की संख्या, नक्षत्र के चक्करों की एक संख्या से एक कम होगी। 7


सूर्य (या किसी ग्रह) को नक्षत्र मण्डल (भ-चक्र) पर एक चक्कर पूर्ण करने में लगने वाला काल सूर्य (सूर्य या किसी ग्रह) के लिए ”तत्सम्बन्धित वर्ष” कहलाता है। सूर्य के लगातार दो उदयों के मध्य का काल सौर दिन (Solarday)क़हलाता है। ज्योतिष का मत है कि एक महायुग ४३,२०,००० सौर वर्ष 8 का होता है। उसी महायुग में १,५८,२२,३७,८२८ नाक्षत्र दिन 9 (Sidereal day) होते हैं। सौर दिनों की संख्या नाक्षत्र दिनों की संख्या से सौर वर्षों की संख्या घटाने पर प्राप्त होती है क्योंकि सूर्य प्रतिवर्ष एक चक्कर पूर्ण करता है।
अत: एक महायुग में सौर दिनों की संख्या = नाक्षत्र दिनों की संख्या - सौर वर्षो की संख्या
= १५८२२३७८२८ - ४३२००० = १५७७९१७८२८
अत: एक सौर वर्ष में सौर दिनों (दिन, घटि, पल) की संख्या
= १५७७९१७८२८ / ४३२०००
= ३६५.२५८७ = ३६५/१५/३० (दि०घ०प०)
= ३६५ १/४ सौर दिन
(Solarday)
इसी प्रकार, एक सौर वर्ष में नाक्षत्र दिनों की संख्या-
= १५८२२३७८२९ / ४३२००० = ३६६.२५८७ = ३६६/१५/३० (दि०घ०प०)
= ३६६ १/४ नाक्षत्र दिन।
अत: ३६५ १/४ सौर दिन = १ वर्ष = ३६६ १/४ नाक्षत्र दिन। 10
****************************************

References
1
सूर्य सिद्धान्त, मानाध्याय,(५०० ई. पू.)
“ब्राह्मं दिव्यं तथा पित्र्यं प्राजापत्यं च गौरवम्। सौर०च सावनं चान्द्रमार्क्षं मानानि वै नव।।१।।”
2
सूर्य सिद्धान्त, भूगोलाध्याय,
“तन्मध्ये भ्रमाणां भानामधोऽध: क्रमशस्तथा।।३०।।
मन्द मरेज्य भूपुत्र सूर्य शुक्रेन्दुजेन्दव:।।”
3
सूर्य सिद्धान्त, भूगोलाध्याय,
“मन्दादध:क्रमेण स्युस्चतुर्था दिवसाधिप:।।७८।।”
4
आर्यभट्ट, गोलपाद:, (५९९ ई.)
“अनुलोमगतिर्नौस्थ: पश्यत्यचलं विलोमगं यद्वत्।
अचलानि भानि तद्वत् समपश्चिमगानि लंकायाम्।।”
5
सूर्य सिद्धान्त, भूगोलाध्याय, (५०० ई. पू.)
“मध्ये समन्ताद्दण्डस्य भूगोलो व्योम्नि तिष्ठति।
विभ्राण: परमांशक्ति ब्रह्मणो धारणात्मिकाम्।।३२।।”
6
सूर्य सिद्धान्त, मध्यमाधिकार, (५०० ई. पू.)
“प्राग्गतित्वमतस्तेषां भगणै: प्रत्यहं गति:।
परिणाहवशाद्भिन्ना तद्वशात् भानि भुञ्जते।।२६।।”
7
सूर्य सिद्धान्त, मध्यमाधिकार, (५०० ई. पू.)
”अत्रभोदयाभगणै: स्वै: स्वैरूना: स्व स्वोदया:।”
सूर्यसिद्धान्त, टीका,
”इत्युक्तेस्तु सर्वेषामेव ग्रहाणां सावन दिनानि स्वस्वोदयद्वयान्तर्गत कालात्मकानि भवन्ति, परञ्च तेषु सूर्यसम्बन्धि सावनानां परमोपयोगित्वातसावन दिन शब्देनामी भूमी सावन वासरा एवं सर्वैगृह्यन्ते।”
8
सूर्य सिद्धान्त, मध्यमाधिकार, (५०० ई. पू.)
“युगे सूर्यज्ञशुक्राणां खचतुष्करदार्णवा।।२९।।”
9
सूर्य सिद्धान्त, मध्यमाधिकार, (५०० ई. पू.)
“भानामष्टाक्षि वस्वद्रित्रिद्विद्व्यष्टशरेन्दव:।
भोदयाभगणै: स्वै: स्वैरूना: स्वस्वोदया युगे।।३४।।”
10
C.J.L., Wagstaff, London (1934)
Chapter ‘Time’, last line. -The Properties of Matter


Apr 06 2008

आस्‍ति‍क दर्शन कि‍न्‍हें कहा जाता है ?

Tag: Indian Culture, Vedic Science, जिज्ञासासुदीप साकल्ले @ 11:39 am

षड्दर्शन अर्थात् न्‍याय, वैशेषि‍क, सांख्‍य, योग, मीमांसा तथा वेदान्‍त आस्‍ति‍क दर्शन कहे जाते हैं.


Apr 05 2008

यमराज का इस्तीफा

Tag: Deep Thinkers and Fools, Hindi Sahitya, जिज्ञासासुदीप साकल्ले @ 9:11 pm

एक दिन
यमदेव ने दे दिया
अपना इस्तीफा।
मच गया हाहाकार
बिगड़ गया सब
संतुलन,
करने के लिए
स्थिति का आकलन,
इन्द्र देव ने देवताओं
की आपात सभा
बुलाई
और फिर यमराज
को कॉल लगाई।

‘डायल किया गया
नंबर कृपया जाँच लें’
कि आवाज तब सुनाई।

नये-नये ऑफ़र
देखकर नम्बर बदलने की
यमराज की इस आदत पर
इन्द्रदेव को खुन्दक आई,

पर मामले की नाजुकता
को देखकर,
मन की बात उन्होने
मन में ही दबाई।
किसी तरह यमराज
का नया नंबर मिला,
फिर से फोन

लगाया गया तो
‘तुझसे है मेरा नाता
पुराना कोई’ का
मोबाईल ने
कॉलर टयून सुनाया।

सुन-सुन कर ये
सब बोर हो गये
ऐसा लगा शायद
यमराज जी सो गये।

तहकीकात करने पर
पता लगा,
यमदेव पृथ्वीलोक
में रोमिंग पे हैं,
शायद इसलिए,
नहीं दे रहे हैं
हमारी कॉल पे ध्यान,
क्योंकि बिल भरने
में निकल जाती है
उनकी भी जान।

अन्त में किसी
तरह यमराज
हुये इन्द्र के दरबार
में पेश,
इन्द्रदेव ने तब
पूछा-यम
क्या है ये
इस्तीफे का केस?

यमराज जी तब
मुँह खोले
और बोले-

हे इंद्रदेव।
‘मल्टीप्लैक्स’ में
जब भी जाता हूँ,
‘भैंसे’ की पार्किंग
न होने की वजह से
बिन फिल्म देखे,
ही लौट के आता हूँ।

‘बरिस्ता’ और ‘मैकडोन्लड’
वाले तो देखते ही देखते
इज्जत उतार
देते हैं और
सबके सामने ही
ढ़ाबे में जाकर
खाने-की सलाह
दे देते हैं।

मौत के अपने
काम पर जब
पृथ्वीलोक जाता हूँ
‘भैंसे’ पर मुझे
देखकर पृथ्वीवासी
भी हँसते हैं
और कार न होने
के ताने कसते हैं।

भैंसे पर बैठे-बैठे
झटके बड़े रहे हैं
वायुमार्ग में भी
अब ट्रैफिक बढ़ रहे हैं।
रफ्तार की इस दुनिया
का मैं भैंसे से
कैसे करूँगा पीछा।
आप कुछ समझ रहे हो
या कुछ और दूँ शिक्षा।

और तो और, देखो
रम्भा के पास है
‘टोयटा’
और उर्वशी को है
आपने ‘एसेन्ट’ दिया,
फिर मेरे साथ
ये अन्याय क्यों किया?

हे इन्द्रदेव।
मेरे इस दु:ख को
समझो और
चार पहिए की
जगह
चार पैरों वाला
दिया है कह
कर अब मुझे न
बहलाओ,
और जल्दी से
‘मर्सिडीज़’ मुझे
दिलाओ।
वरना मेरा
इस्तीफा
अपने साथ
ही लेकर जाओ।
और मौत का
ये काम
अब किसी और से
करवाओ।

 

-अमित कुमार सिंह


Feb 16 2008

India - एक नज़र

Tag: Deep Thinkers and Foolsसुदीप साकल्ले @ 9:55 am

If I were asked under what sky the human mind has most fully developed some of its choicest gifts, has most deeply pondered over the greatest problems of life, and has found solutions of some of them which well deserve the attention even of those who have studied Plato and Kant, I should point to India. And if I were to ask myself from what literature we who have been nurtured almost exclusively on the thoughts of Greeks and Romans, and of the Semitic race, the Jewish, may draw the corrective which is most wanted in order to make our inner life more perfect, more comprehensive, more universal, in fact more truly human a life…again I should point to India.”

“The Upanishads are the … sources of … the Vedanta philosophy, a system in which human speculation seems to me to have reached its very acme.”

“I spend my happiest hours in reading Vedantic books. They are to me like the light of the morning, like the pure air of the mountains - so simple, so true, if once understood.”

– Friedrich Max Müller(December 6, 1823 – October 28, 1900)

मैक्स म्युलर जर्मनी के थे और इनके बारे में स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि पश्चिमी दुनिया में अगर किसी ने वेदांत के मर्म को समझा है तो वो हैं मैक्स म्युलर. मैक्स म्युलर 6 दिसंबर 1823 को पैदा हुए थे और उनकी मौत हुई वर्ष 1900 में लेकिन 16 साल की उम्र से ही उनकी संस्कृत में गहरी रुचि पैदा हो गई थी और इसी की वजह से मैक्स म्युलर ने सेक्रेड बुक्स ऑफ़ द ईस्ट के नाम से 50 खंड लिखे हैं जिनमें शामिल है ऋग्वेद का भाष्य और उपनिषदों के अनुवाद. मैक्स म्युलर के पिता विल्हेम म्युलर श्रंगार रस के कवि थे और उनकी माँ जर्मनी के एक प्रांत के मुख्यमंत्री की बेटी थीं. मैक्स म्युलर ने संस्कृत के अलावा फ़ारसी और अरबी भी पढ़ी. उन्होंने भारतीय धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन ईस्ट इंडिया कंपनी के ब्रिटेन लाए गए दस्तावेज़ों, ब्रह्मसमाज के भारतीय सदस्यों और ऑक्सफ़ोर्ड जैसे जाने माने विश्वविद्यालयो में अन्य यूरोपीय विद्वानों के साथ मिलकर किया. कुछ हिंदू लेखकों ने मैक्स म्युलर की ईसाई धर्म को हिंदू धर्म से बेहतर बताने की कोशिश करने वाला कहकर आलोचना की है तो कई ईसाई धर्मगुरुओं ने उनके जीवनकाल में उन्हें ईसाइयों के ख़िलाफ़ बताया था. लेकिन भारत के बारे में मैक्सम्युलर ने लिखा है, “अगर कोई मुझसे पूछे कि प्रकृति प्रदत्त गुणों का किस मानव मस्तिष्क ने सबसे बेहतर उपयोग किया है, किसने जीवन की सबसे बड़ी समस्याओं का गहराई से अध्ययन किया है – और वो कौन है जिसके साहित्य और ज्ञान को प्लेटो और कांट के दर्शन को समझने वालों को भी पढ़ना चाहिए, तो मैं उसे भारत का रास्ता बताऊँगा.”


Jan 25 2008

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है (Sar faroshi ki tammana, aab humare dil mai hai)

Tag: Deep Thinkers and Fools, Hindi Sahitya, Indian Cultureसुदीप साकल्ले @ 1:36 pm

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
- By Ram Prasad Bismil

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है ।

करता नहीं क्यों दुसरा कुछ बातचीत,
देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफिल मैं है ।

रहबर राहे मौहब्बत रह न जाना राह में
लज्जत-ऐ-सेहरा नवर्दी दूरिये-मंजिल में है ।

यों खड़ा मौकतल में कातिल कह रहा है बार-बार
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है ।

ऐ शहीदे-मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार
अब तेरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफिल में है ।

वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमां,
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है ।

खींच कर लाई है सब को कत्ल होने की उम्मींद,
आशिकों का जमघट आज कूंचे-ऐ-कातिल में है ।

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है ।
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रहबर - Guide
लज्जत - tasteful
नवर्दी - Battle
मौकतल - Place Where Executions Take Place, Place of Killing
मिल्लत - Nation, faith

है लिये हथियार दुश्मन ताक मे बैठा उधर
और हम तैय्यार हैं सीना लिये अपना इधर
खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में है
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हाथ जिनमें हो जुनून कटते नही तलवार से
सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से
और भडकेगा जो शोला सा हमारे दिल में है
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हम तो घर से निकले ही थे बांधकर सर पे कफ़न
जान हथेली में लिये लो बढ चले हैं ये कदम
जिंदगी तो अपनी मेहमान मौत की महफ़िल मैं है
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

दिल मे तूफानों की टोली और नसों में इन्कलाब
होश दुश्मन के उडा देंगे हमे रोको न आज
दूर रह पाये जो हमसे दम कहाँ मंजिल मे है
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है


Dec 27 2007

उठो लाल अब आँखें खोलो

Tag: Hindi Sahityaसुदीप साकल्ले @ 10:52 am

उठो लाल अब आँखें खोलो
पानी लायी हूँ, मुँह धोलो

बीती रात कमल-दल फूले
उनके ऊपर भँवरे झूले

चिड़िया चहक उठीं पेड़ों पर
बहने लगी हवा अति सुन्दर

भोर हुई सूरज उग आया
नभ में हुई सुनहरी काया

आसमान में लाली छाई
ठंडी हवा बही सुखदाई
नन्हीं-नन्हीं किरणें आयीं
फूल हँसे कलियाँ मुसकायीं

इतना सुन्दर समय ना खोओ
मेरे प्यारे अब मत सोओ


Dec 27 2007

Hinduism - an Intorduction

Tag: Deep Thinkers and Fools, Indian Culture, Vedic Scienceसुदीप साकल्ले @ 10:38 am

Hinduism is a universal religion. Its primary emphasis is on universal brotherhood. It views the world as one family. It believes that man is divine in nature and realization of that supreme truth as the primary aim of all human activity. It is therefore unfortunate that for a very long time this religion of great antiquity has been in the clutches a few privileged castes.

It would be a great service to the cause of Hinduism if the present day Vedic teachers identify bright children from the lower castes and start teaching them the Vedas and the Upanishads and allow them to serve God in the temples of India. The strength of Christianity stems from dedicated missionaries who come from all sections of society. The weakness of Hinduism and of Hindu society is caste system, which divides people into divergent and bickering groups and keeps them apart. Perhaps there is no other nation in the world that is as openly and shamelessly as racial as India. To be born in an upper caste is a matter of pride whether the family to which a person belongs deserves it or not. A number of Indians who visit foreign countries often complain about being treated differently on account of their skin color or accent. They overlook the fact that a vast number of people in their own country exhibit a far greater obsession with accent, skin color and caste. Indian film stars put on white makeup, on the screen and off the screen, even if they are black, to look acceptable and desirable. The country’s democracy is not a true democracy, but castocracy, where people vote and leaders are elected on caste lines. The Indian political parties thrive and succeed by appealing to this base emotion of people.

There are countless scholars who justify Hindu caste system quoting chapter and verse from the scriptures, ignoring the fact that they were convenient interpolations or authored by bigoted scholars in an otherwise sacred lore to justify a cruel and unjust system using the very authority of God.

Caste System has been the bane of Hindu society for centuries. In terms of impact, it did much greater damage for a much longer period to a great many people than the slave system of the western world or the witch-hunting practices of medieval Europe. The Hindu caste system was a clever invention of the later Vedic society, justified by a few law makers. The upper castes found it convenient to retain and perpetuate their social and religious distinction and political and economic advantage. With the exception of Saivism and a few ascetic traditions, most of the ancient sects of Hinduism were caste biased.

The idea of staying away from unclean people is understandable in a society that was obsessed with the concept of physical and mental purity. There is nothing unusual with people who are selective in choosing their friends and relationships. It is normal behavior to stay away from people who are found to be socially deviant, untrustworthy or unfamiliar. It is an expression of our social intelligence and self-preservation instinct. Personal hygiene, family background and financial status do matter today in society as it was thousands of years ago. But what was wrong with the Vedic society was it recognized inequalities among men based on birth and family lineage and proclaimed it to be the will of God. This line of thought was perpetuated by Vedic scholars for centuries through the authority of scriptures and fear of divine retribution. They wrongfully created human stereotypes to justify a social structure that favored a few at the expense of many, denying a vast majority of people opportunities to use their inborn talents and pursue their own dreams and aspirations.


Dec 26 2007

झाँसी की रानी

Tag: Hindi Sahityaसुदीप साकल्ले @ 2:45 pm

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।

चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।

वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।

महाराष्टर-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,

चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।

निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।

अश्रुपूर्णा रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।

रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठुर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात?
जबकि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।

बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी रोयीं रिनवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
‘नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार’।

यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।

हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,

जबलपूर, कोल्हापूर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।

लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बड़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वन्द्ध असमानों में।

ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।

अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।

पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये अवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।

घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,

दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।

तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

सुभद्रा कुमारी चौहान (1904-1948) हिन्दी भाषा की प्रसिद्ध कवयित्री थीं।


Dec 11 2007

ईसा मसीह के सलीब पर आई ऐन आर आई लिखा रहता है, उसका क्या मतलब है?

Tag: जिज्ञासाप्रकाश खन्डेलवाल @ 10:39 am

ईसा मसीह के सलीब पर आई ऐन आर आई लिखा रहता है, उसका क्या मतलब है?

ये लैटिन भाषा के वाक्यांश Iesus Nazarenus Rex Iudaeorum का संक्षिप्त रूप है. इसका मतलब है नैज़ेरथ के ईसा यहूदियों के राजा. जिस तरह अपराधियों को पहचान के लिए कोई संख्या दी जाती है उसी तरह ये ईसा की पहचान थी जब उन्हें सूली पर चढ़ाया गया था.


Dec 11 2007

भारत एक खोज

Tag: Vedic Scienceप्रकाश खन्डेलवाल @ 10:10 am

[flv:http://kanhaiya.com/infovinity/videos/bharatekkhoj.flv 320 240]

सृष्टि से पहले सत नहीं था, असत भी नहीं
अंतरिक्ष भी नहीं, आकाश भी नहीं था
छिपा था क्या कहाँ, किसने देखा था
उस पल तो अगम, अटल जल भी कहाँ था

सृष्टि का कौन है कर्ता कर्ता है यह वा अकर्ता
ऊंचे आसमान में रहता सता अध्यक्ष बना रहता
वही सचमुच में जानता, या नहीं भी जानता
हैं किसी को नहीं पता नहीं है पता

वो था ह्रन्यगर्भ सृष्टि से पहले विद्यमान
वही तो सारे भूतजगत का स्वामी महान
जो है अस्तित्व में धरती आसमान धारण कर
ऐसे किस देवता की उपासना करें हम अवि देकर

जिस के बल पर तेजोमय है अम्बर
पृथ्वी हरी भरी स्थापित स्थिर
स्वर्ग और सूरज भी स्थिर
किस देवता की उपासना करें हम अवि देकर

गर्भ में अपने अग्नि धारण कर पैदा कर
व्यापा था जल इधर उधर नीचे ऊपर
जगा चुके वो ऐकमेव प्राण बनकर
किस देवता की उपासना करें हम अवि देकर

ओम! सृष्टि निर्माता स्वर्ग रचियता पुर्वज रक्षा कर
स्तय धर्म पालक अतुल जल नियामक रक्षा कर
फैली हैं दिशाए बाहू जैसी उसकी सब में सब पर
ऐसे ही देवता की उपासना करें हम अवि देकर
ऐसे ही देवता की उपासना करें हम अवि देकर

ऋग्वेद (१०:१२९)  से सृष्टि सृजन की यह श्रुत 


Dec 05 2007

चारु चंद्र की चंचल किरणें - मैथिलीशरण गुप्त(पंचवटी)

Tag: Hindi Sahitya, Indian Cultureसुदीप साकल्ले @ 10:34 pm

चारु चंद्र की चंचल किरणें,
खेल रहीं थीं जल थल में।
स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई थी,
अवनि और अम्बर तल में।
पुलक प्रकट करती थी धरती,
हरित तृणों की नोकों से।
मानो झूम रहे हों तरु भी,
मन्द पवन के झोंकों से।

पंचवटी की छाया में है,
सुन्दर पर्ण कुटीर बना।
जिसके बाहर स्वच्छ शिला पर,
धीर वीर निर्भीक मना।
जाग रहा है कौन धनुर्धर,
जब कि भुवन भर सोता है।
भोगी अनुगामी योगी सा,
बना दृष्टिगत होता है।

बना हुआ है प्रहरी जिसका,
उस कुटिया में क्या धन है।
जिसकी सेवा में रत इसका,
तन है, मन है, जीवन है।

– मैथिलीशरण गुप्त  (पंचवटी)


Nov 30 2007

धर्मग्रन्थ

Tag: Hindi Sahitya, Vedic Science, जिज्ञासासुदीप साकल्ले @ 9:20 am

पौराणिक कथाओं को पढ़कर यदि ऐसा लगे कि ये सब ऊल-जुलूल बातें हैं तो आश्चर्य की बात नहीं है। ऐसा लगना स्वाभाविक है। पुराणों के सम्बंध कहा जाता है कि वेद में निहित ज्ञान के अत्यन्त गूढ़ होने के कारण आम आदमियों के द्वारा उन्हें समझना बहुत कठिन था, इसलिये रोचक कथाओं के माध्यम से वेद के ज्ञान की जानकारी देने की प्रथा चली। इन्हीं कथाओं के संकलन को पुराण कहा जाता हैं। पौराणिक कथाओं में ज्ञान, सत्य घटनाओं तथा कल्पना का संमिश्रण होता है। पुराण ज्ञानयुक्त कहानियों का एक विशाल संग्रह होता है। पुराणों को वर्तमान युग में रचित विज्ञान कथाओं (scince fictions) के जैसा ही समझा जा सकता है।

किन्तु देखा जाये तो पौराणिक कथाओं में कल्पना या यह कहें कि कपोल कल्पना आवश्यकता से अधिक है जो कि इन कथाओं को अतिरंजित बना देती हैं। कल्पना का आवश्यकता से अधिक होने का कारण शायद यह हो सकता है कि ये कथाएँ प्राचीन काल से चली आ रही हैं और समय समय पर अनेक लोगों ने इन कथाओं में अपने-अपने हिसाब से परिवर्तन कर दिया है। इन कथाओं की रचना के समय इनका उद्देश्य अवश्य ही कहानी के रूप में सत्य घटनाओं तथा ज्ञान की बातो को बताना रहा होगा किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि कालान्तर में केवल मनोरंजन ही इन कथाओं का मुख्य उद्देश्य बन कर रह गया।

 इतना सब कुछ होने के बाद भी यदि इन कथाओं का विश्लेषण किया जाये तो कुछ न कुछ जानकारी अवश्य ही प्राप्त हो सकती है। इन कथाओं में अधिकतर बातें प्रतीक रूप में हैं जैसे कि श्रीमद्भागवत् पुराण की कथा में वर्णित हैः

“भूलोक तथा द्युलोक के मध्य में अन्तरिक्ष लोक है। इस द्युलोक में सूर्य भगवान नक्षत्र तारों के मध्य में विराजमान रह कर तीनों लोकों को प्रकाशित करते हैं। उत्तरायण, दक्षिणायन तथा विषुक्त नामक तीन मार्गों से चलने के कारण कर्क, मकर तथा समान गतियों के छोटे, बड़े तथा समान दिन रात्रि बनाते हैं। जब भगवान सूर्य मेष तथा तुला राशि पर रहते हैं तब दिन रात्रि समान रहते हैं। जब वे वृष, मिथुन, कर्क, सिंह और कन्या राशियों में रहते हैं तब क्रमशः रात्रि एक-एक मास में एक-एक घड़ी बढ़ती जाती है और दिन घटते जाते हैं। जब सूर्य वृश्चिक, मकर, कुम्भ, मीन ओर मेष राशि में रहते हैं तब क्रमशः दिन प्रति मास एक-एक घड़ी बढ़ता जाता है तथा रात्रि कम होती जाती है। सूर्य का रथ एक मुहूर्त (दो घड़ी) में चौंतीस लाख आठ सौ योजन चलता है। इस रथ का संवत्सर नाम का एक पहिया है जिसके बारह अरे (मास), छः नेम, छः ऋतु और तीन चौमासे हैं।”

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Nov 30 2007

वैदिक ज्ञान का विषय ही क्यो ?

Tag: Indian Culture, Vedic Science, जिज्ञासासुदीप साकल्ले @ 9:11 am

हमारे पुर्वजो - रिशि मुनियो ने काफ़ी सोच समझ के और कडे अनुसनधान के बाद ये सभी शब्द हमे दिये है, मेरे खयाल से इस तथ्य पर हम ध्यान दे तो भविष्य के कई महत्वपुर्ण सुत्र हमे प्राप्त हो सकते है।

कुछ सवाल जो मै अपने आप से लगातार पूछता हु ,कि

तीन देव क्यो है ? चार क्यो नही ?

१६ सन्स्कार ही क्यो ? ज्यादा कम क्यो नही ?

आप भी सोचिये शायद हम कुछ अर्थपुर्ण ढुन्ढ ले ?

अगर हम सब साहित्य को कहानी भी मान लेवे तो भी इतने सारे कथा कारो ने जैसे वेद व्यास , वाल्मिक  आदी की कथाओ मै सभी देव समान क्यू है ?

क्यो विष्णु भगवान का तीसरा नैत्र नही है , बस शिव का ही है ?

मेरा ये द्र्ढ विशवास है कि इन सभी कथाओ के माध्यम से हमे व्रहद ज्ञान का कोष सोपा गया है, बस आप और हम इस को समझने का प्रयास करे और सफ़लता प्राप्त करे इसी उद्देश से मै सुदीप साकल्ले और मेरे साथी व मित्र प्रकाश खण्डेलवाल, ब्लोग जगत मे प्रवेश करते है। आशा है कि आप लोगो का सहयोग ,  मार्गदर्शन और आशिर्वाद हमे आगे बढने मै मदद करेगा

—————————-

एक ॐकार

माता - पिता

तीन देव - ब्रह्मा, विष्णु, महेश(शंकर)

चार वेद - ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद

चार आश्रम - ब्रह्मचर्य, गृहस्त, वानप्रस्थ, सन्यास

चार धाम - बद्रीनाथ (उत्तर में), जगन्नाथपुरी (पूर्व में), रामेश्वरम (दक्षिण में), द्वारका (पश्चिम में)

चार पुरुषार्थ - धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष

चार वर्ण - ब्राहम्ण , क्षत्रिया , वैश्य , क्षुद्र

चार युग - कृतयुग (सत्युग), त्रेतायुग, द्वापरयुग , कलियुग (वर्तमान)

पंचामृत - दही (दधि) + दूध (दुग्ध) + घी (घृत) + मधु (शहद) + गंगाजल

छः शास्त्र - न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा, वेदान्त

सप्त ऋषि - Atri, Brighu, Kutsya, Vasishtha, Gautam, Kashyapa and Angirasa

सप्त ऋषि तारा मण्डल - Kratu (Dubhe), Pulaha(Merak), Pulastya(Phecda), Atri(Megrez), Angira(Alioth), Vasishtha(Mizar), Marichi(Alkaid)

सात दिन - रविवार, सोमवार, मंगलवार, बुधवार, वृहस्पतिवार (गुरुवार), शुक्रवार, शनिवार

आठ प्रकार के विवाह - ब्राह्म विवाह, दैत्य विवाह, ऋषि विवाह, प्रजापत्य विवाह, असुर विवाह, गान्धर्व विवाह, राक्षस विवाह, पैशाच विवाह

नव ग्रह - Sun (सूर्य), Moon (चंद्र), Mars (मंगल), Mercury (बुध), Jupiter (बृहस्पति), Venus (शुक्र), Saturn (शनि), Head of Demon Snake - Ascending/North Lunar Node (राहु), Tail of Demon Snake - Descending/South Lunar Node (केतु)

दस अवतार - Matsya, Kurma, Varaha, Narasimha, Vamana, Parashurama, Rama, Krishna, Buddha, Kalki

भारतीय मास (12) - चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद (भादो), अश्विन (क्वार), कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ, फाल्गुन

समुद्र मंथन में निकले चौदह रत्न - हलाहल (विष),कामधेनु (या सुरभि गाय), श्री मणि रम्भा वारुणी अमृत, ऐरावत, पाञ्चजन्य शंख, कल्पवृक्ष, चन्द्रमा, धन्वन्तरि, घोड़ा

सोलह संस्कार - (१) गर्भधारण संस्कार (२) पुंसवन (दुग्ध) संस्कार - तीसरे माह (३) सीमान्तनयन - छठवें माह (४) जन्म या जातकर्म - जन्म के समय किया जाने वाला (५) नामकरण(निष्क्रमण) - जन्म के कुछ दिनों बाद, शिशु को सूर्य का दर्शन कराकर उसे एक नाम प्रदान किया जाता है। (६) निस्करण (७) अन्नप्राशन - जब शिशु को सबसे पहले पकाया हुआ भोजन दिया जाता है। (८) मुंडन (९) कर्णभेदन या कर्णछेदन (१०) उपनयन - इसमें बालक को यज्ञोपवीत दिया जाता है और शिक्षा के लिये गुरू के पास भेजा जाता है। (११) वेदाध्ययन (वेद का अध्ययन) (१२) संवर्तन - शिक्षा समाप्ति के पश्चात (१३) विवाह (१४) वानप्रस्थ - पचास वर्ष की आयु की प्राप्ति पर (१५) सन्यास - प्राय: ७५ वर्ष की आयु की प्राप्ति पर (१६) दाह संस्कार - अन्तिम संस्कार

अठारह पूराण

1-Brahm Puraan, 2-Padm Puraan, 3-Vishnu Puraan, 4-Shiv Puraan, 5-Bhaagvat Puraan, 6-Naarad Puraan, 7-Maarkandeya Puraan, 8-Agni Puraan, 9-Bhavishya Puraan, 10-Brahm Vaivart Puraan, 11-Ling Puraan, 12-Vaaraah Puraan, 13-Skand Puraan, 14-Vaaman Puraan, 15-Koorm Puraan, 16-Matsya Puraan, 17-Garud Puraan, 18-Brahmaand Puraan,

सत्ताइस नक्षत्र - चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़, सतभिषा, श्रवण, धनिष्ठा, पूर्वभाद्र, उत्तरभाद्र, अश्विन, रेवती, भरणी, कृतिका, रोहणी, मृगशिरा, उत्तरा, पुनवर्सु, पुष्य, मघा, अश्लेशा, पूर्वफाल्गुन, उत्तरफाल्गुन, हस्त

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Nov 24 2007

आराम करो

Tag: Deep Thinkers and Fools, Hindi Sahityaसुदीप साकल्ले @ 12:21 pm

आराम करो
एक मित्र मिले, बोले, “लाला, तुम किस चक्की का खाते हो?
सौ -दो सौ ग्राम के राशन में भी तोंद बढ़ाए जाते हो।
क्या रक्खा माँस बढ़ाने में, मनहूस, अक्ल से काम करो।
संक्रान्ति-काल की बेला है, मर मिटो, जगत में नाम करो।”
हम बोले, “रहने दो लेक्चर, पुरुषों को मत बदनाम करो।
इस दौड़-धूप में क्या रक्खा, आराम करो, आराम करो।

आराम ज़िन्दगी की कुंजी, इससे न तपेदिक होती है।
आराम सुधा की एक बूंद, तन का दुबलापन खोती है।
आराम शब्द में ‘राम’ छिपा जो भव-बंधन को खोता है।
आराम शब्द का ज्ञाता तो विरला ही योगी होता है।
इसलिए तुम्हें समझाता हूँ, मेरे अनुभव से काम करो।
ये जीवन, यौवन क्षणभंगुर, आराम करो, आराम करो।

यदि करना ही कुछ पड़ जाए तो अधिक न तुम उत्पात करो।
अपने घर में बैठे-बैठे बस लंबी-लंबी बात करो।
करने-धरने में क्या रक्खा जो रक्खा बात बनाने में।
जो ओठ हिलाने में रस है, वह कभी न हाथ हिलाने में।
तुम मुझसे पूछो बतलाऊँ, है मज़ा मूर्ख कहलाने में।
जीवन-जागृति में क्या रक्खा जो रक्खा है सो जाने में।

मैं यही सोचकर पास अक्ल के, कम ही जाया करता हूँ।
जो बुद्धिमान जन होते हैं, उनसे कतराया करता हूँ।
दीए जलने के पहले ही घर में आ जाया करता हूँ।
जो मिलता है, खा लेता हूँ, चुपके सो जाया करता हूँ।
मेरी गीता में लिखा हुआ, सच्चे योगी जो होते हैं,
वे कम-से-कम बारह घंटे तो बेफ़िक्री से सोते हैं।

अदवायन खिंची खाट में जो पड़ते ही आनंद आता है।
वह सात स्वर्ग, अपवर्ग, मोक्ष से भी ऊँचा उठ जाता है।
जब ‘सुख की नींद’ कढ़ा तकिया, इस सर के नीचे आता है,
तो सच कहता हूँ इस सर में, इंजन जैसा लग जाता है।
मैं मेल ट्रेन हो जाता हूँ, बुद्धि भी फक-फक करती है।
भावों का रश हो जाता है, कविता सब उमड़ी पड़ती है।

मैं औरों की तो नहीं, बात पहले अपनी ही लेता हूँ।
मैं पड़ा खाट पर बूटों को ऊँटों की उपमा देता हूँ।
मैं खटरागी हूँ मुझको तो खटिया में गीत फूटते हैं।
छत की कड़ियाँ गिनते-गिनते छंदों के बंध टूटते हैं।
मैं इसीलिए तो कहता हूँ मेरे अनुभव से काम करो।
यह खाट बिछा लो आँगन में, लेटो, बैठो, आराम करो।

- गोपालप्रसाद व्यास


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