है प्रीत जहॉ की रीत सदा , मै गीत वहाँ के गाता हुँ
भारत का रहने वाला हुँ … भारत की बात सुनाता हुँ ...
हिन्दी ब्लॉग्गिंग के जगत मे इन्फोविनिटी सिस्ट्म्स की ओर से इक साधारण प्रयास
नमस्ते
इस् ब्लॉग पर आने वाले प्रय्तेक व्यक्ति को सादर नमन ! आशा है कि आप इस ब्लॉग पर प्रकाशित जानकारियों का लाभ उठाएंगे एवं दूसरो को भी लाभान्वित करेगे.
इस १ और ब्लॉग की क्या जरुरत थी ?
“हमारी ओर हर तरफ से ज्ञान का प्रकाश आने दीजिये “
हम इस ब्लॉग पर “बौधिक संपदा” शब्द का खुले शब्दो मे पुरजोर विरोध करते हुए आप लोगो का स्वतन्त्र ज्ञान के क्षेत्र मे हार्दिक अभिनन्दन करते है.
भारतीय होने के नाते मुझे बचपन ये बात काफी अच्छी तरह से समझ आती है कि हमारे धर्मग्रन्थो मे कहीं भी ज्ञान के लिये कोई भी रोयल्टी चुकाने का प्रावधान नही रखा गया है, प्राचीन भारत मे जाति के आधार पर लोगो को ज्ञान से वन्चित रखा गया ना कि कानूनी या आर्थिक आधार पर | इस जातिगत वंचना से ऊपर उठ कर ज्ञान प्राप्ति का प्रावधान भी भारतीय समाज में था| वल्मिल्की से बाबा साहेब आंबेडकर तक सभी इस जातिगत वंचना वयुत्कर्म के प्रत्यक्ष उदहारण है. इनमे किसी ने भी कभी रोयल्टी नहीं चाही, किसी भी ऋषि मुनि ने ये नहीं कहा की इस ज्ञान का उपयोग सिर्फ वह या उसके शिष्य करेंगे | ”बौधिक-संपदा” शब्द युग्म अपने आप में ही थोड़ा विरोधाभासी है , बुद्धि किसी कि जागीर नही हो सकती. प्राचिन काल मे गुरु को सिक्को मे भुगतान नही किया जाता था | शिष्य उसकी गायो को चराता और ज्ञान दुसरो तक पहुचाता था | शायद यही कारण है भारतीय लोग इस बात की परवाह नही करते कि उनके ज्ञान का कोई मोल चुकाया जाये| फिर भी जब – जब भारतीयों को यह सुनने को मिलता है कि किसी पशिचमी जगत के कॉपीराईट कानून के जरिये ज्ञान की उनकी (या यौ कहे हम सबकी) पुरातन विरासत को कैद कर लिया गया है तो उन्हे बहुत दुख होता है|
इस ब्लॉग के जरिये हमारा यही प्रयास होगा कि हम ज्ञान की उप्लब्धता को आसान कर सके| इस प्रयास मे आप सभी के सहयोग कि अपेक्षा है |
कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी |
सिदयों रहा है दुश्मन, दौर-ए-जहाँ हमारा |