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मृगतृष्णा – राहुल उपाध्याय

वो एक पत्थर जिस पर आँखें गड़ी थी जिससे हमारी उम्मीदें जुड़ी थी जैसे का तैसा बेजान पड़ा था जैसा किसी कारीगर ने गढ़ा था रुकते थे सब कोई ठहरता नही था जैसा था सोचा ये तो वैसा नही था … Continue reading

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माता पिता

बहुत रोते हैं लकिन दामन हमारा नम नही होता इन आँसुओं के बरसने का कोई मॉसम नही होता मैं अपने दुश्मनों के बीच भी महफुज होता हुं मेरी माँ की दुआओ का खजाना कम नही होता माँ, माँ सवेंदना है, … Continue reading

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मैं एक आम इन्सान हूं…

मैं एक आम इन्सान हूं… मैं कम बोलता हूं, पर कुछ लोग कहते हैं कि जब मैं बोलता हूं तो बहुत बोलता हूं. मुझे लगता है कि मैं ज्यादा सोचता हूं मगर उनसे पूछ कर देखिये जिन्हे मैंने बिन सोचे … Continue reading

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मैं एक आम इन्सान हूं…

मैं एक आम इन्सान हूं… मैं कम बोलता हूं, पर कुछ लोग कहते हैं कि जब मैं बोलता हूं तो बहुत बोलता हूं. मुझे लगता है कि मैं ज्यादा सोचता हूं मगर उनसे पूछ कर देखिये जिन्हे मैंने बिन सोचे … Continue reading

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