Monthly Archives: December 2007

झाँसी की रानी

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी, गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी, दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी। चमक उठी सन सत्तावन में, … Continue reading

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चारु चंद्र की चंचल किरणें – मैथिलीशरण गुप्त(पंचवटी)

चारु चंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं थीं जल थल में। स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई थी, अवनि और अम्बर तल में। पुलक प्रकट करती थी धरती, हरित तृणों की नोकों से। मानो झूम रहे हों तरु भी, मन्द पवन के … Continue reading

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