उठो लाल अब आँखें खोलो
पानी लायी हूँ, मुँह धोलो
बीती रात कमल-दल फूले
उनके ऊपर भँवरे झूले
चिड़िया चहक उठीं पेड़ों पर
बहने लगी हवा अति सुन्दर
भोर हुई सूरज उग आया
नभ में हुई सुनहरी काया
आसमान में लाली छाई
ठंडी हवा बही सुखदाई
नन्हीं-नन्हीं किरणें आयीं
फूल हँसे कलियाँ मुसकायीं
इतना सुन्दर समय ना खोओ
मेरे प्यारे अब मत सोओ
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बहुत बढ़िया लिखते रहिए
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बहुत बढ़िया लिखते रहिए
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बहुत सुन्दर रचना है।बधाई।लिखते रहें,बहुत् अच्छा लिखते हैं।
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achcha laga padh ke….
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Is this an old poem? I only remember the first two lines, from my school book back in 1971.
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bachpan main hindi ki kitab main sabse pehla yahi kavita thi. sirf pehli do lines yaad reh gai thi. aaj puri pad ke maza aa gaya. kavita ki hi tarah iska chitra bhi bahut sunder thaa.
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Really its a flash back of childhood, i read this poem in thrid standard and could remeber only first two lines. now feeling good to read complete poem.
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